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शुभ भोर

शुभ भोर😊😊

शनिवार, 08/08/26

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शब्दों ने किया श्रृंगार

देखो ! सज गई सुन्दर शब्द न्यारी… 

निखर निखर कर आती नए काव्य रच जाती…..

अदभुत प्रेम जगाती अपनी ओर ऐसे खिंचे हैं छोड़ दूं दुनिया सारी….

जैसे विरह की प्रेमिका प्रेम बांह पसारी….

 नए शब्द की सज गई है फुलवारी….

नव नव फुलों की क्यारी..

तन मन की दुर्बलता हटाए । प्रेम विश्वास जगाए ।

अब,

शब्दों ने किया श्रृंगार

सुसज्जित करना है अलंकार से…

न चाहे हीरे सोने की हार…

दिन रात बस ये चाहें आलिंगन हो प्रेम से काव्य प्रीत से बन जाए।

कहीं किसी की हौसला..

कहीं प्रतिशोध निकल जाए..

प्रहार बने मूक के बोल..

गीत बने मीरा के बोल…

सूरदास की भांति कृष्ण अनुराग जगाए…

शब्दों ने किया श्रृंगार

इनको मन की फुलवारी में बिठाकर अपनी उपवन सजा लें।

मीठी खुशबू से अपना मन बहला लें।

शब्दों ने लिया प्रेम का आवरण ओढ …

हम उसी में मन रमा लें ॥

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

              मुम्बई

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