
विधा:–काव्य
शीर्षक:–साँसों का सौदा
कैसा ये बवाल मचा हैं।
हर तरफ व्यापार ये फैला।।
हर चेहरा नकाब हैं ओढ़ा
चेहरे पर चेहरा लगा है।
आँखों में छाई है निराशा
हर तरफ छाया डर कैसा
हो रहा साँसों का सौदा मौत हुई सस्ती।।
नदियाँ दूषित वायु दूषित
इंसा का आज मन हुआ दूषित
प्रेम के नाम पर छल होता
धोखा और फरेब होता हैं।।
खनकों मे बिक जाता जीवन
कैसा ये बवाल मचा हैं
इंसा ही इंसा का दुश्मन।।
टूट रहा है प्रेम का बंधन
छूट रहा अपनों का संगत
टूट रहा साँसों का डोर
हर तरफ छाया अँधेरा
जीवन एक व्यापार बना
हो रहा साँसों का सौदा, मौत हुई सस्ती।।
हो रहा विकास ये कैसा
छीनकर हरियाली धरा की
लूटकर बच्चों की बचपन
घुटन भरीं साँसें देकर
कर रहें साँसों का सौदा
मिटाकर मिट्टी की खुशबू
छीन रहा आँखों की ज्योति
हो रहा साँसों का सौदा, मौत हुई सस्ती।।
स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा




