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झंकार

झंकार

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उठ रही मन में झंकार,

वर्षो बाद किया है झंकृत मेरे मन का तार,

कुंठित मन था

व्यथित मन था

कोई नहीं आता था द्वार,

मन के पट सब बंद पड़े थे,

तभी उमंग ने द्वार खटखटाया,

खोला सुन कर स्वर को!

लगा जैसे कि अपना मन हो,

परिवर्तित सी लग रही ये ! कोई रोग नहीं न … ही है अवसाद,

हृदय पटल को झुंकृत करने वाली,

 स्वयं की पीड़ा हरने वाली,

उठी है लेकर हिलकोरे,

जैसे पथ पर मेरे पुष्पों की बहार,

सच सा प्रतित लग रहा, किसकी है ये झंकार !

अमृत सी मीठी है थोड़ी,

खुशियों की मोती बिखेरती,

सफलता की चढ़ रही सीढ़ी से मिली है सम्मान,

वर्षो की बड़ियां टुटी है,

खुलकर निखर रही है!

शायद अब! हम थोड़े से निरवर रहे हैं,

शब्दों के मोती को समेट कर बना रहे हैं हार,

मन को जो झंकृत कर रही है,

हृदय में ल्हू का कर रही संचार,

अमृत सी मीठी बन कर

हवा में उमंग घोल रही है,

कोई और नहीं !

अन्तस वीणा की है झंकार !

जो झंकृत कर रही है मन का तार,

खोल रही है हृदय अब !

मेरी खुशियों का द्वार,

अन्तस वीणा की मीठी झंकार !!

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

       मुंबई

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