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“नहर की पुकार”

 

“नहर की पुकार”

हमारे गाँव की शान पुरानी,
पंचक्की से जुड़ी कहानी।
नहर का पानी जीवनधारा,
सबका इसमें बसे सहारा।।

खोल दो सरकार नहर हमारी,
बहे धारा यह प्यारी प्यारी।
घाट बचाओ, रिवाज़ बचाओ,
गाँव हमारा फिर मुसकाओ।।

धान गेहूँ सब पिसते यहाँ,
रोज़ी रोटी मिलती जहाँ।
चक्की रुक गई, मन घबराए,
बिन पानी सब काम ठहर जाए।।

खोल दो सरकार नहर हमारी,
बहे धारा यह प्यारी प्यारी।
घाट बचाओ, रिवाज़ बचाओ
गाँव हमारा फिर मुसकाओ।।

सड़क बनी तो राह रुकी,
गाँव की धड़कन भी थमी।
दो माह बीते, आस अधूरी,
किससे कहें हम अपनी दूरी।।

खोल दो सरकार नहर हमारी,
बहे धारा यह प्यारी प्यारी।
घाट बचाओ, रिवाज़ बचाओ,
गाँव हमारा फिर मुसकाओ।।

बच्चों की हँसी, बड़ों का सहारा,
नहर से ही है सबको गुज़ारा।
परंपरा की लौ मत बुझाओ,
गाँव की धड़कन फिर जलाओ।।

खोल दो सरकार नहर हमारी,
बहे धारा यह प्यारी प्यारी।
घाट बचाओ, रिवाज़ बचाओ,
गाँव हमारा फिर मुसकाओ।।

नहर की धारा लौटे फिर से,
बस इतनी सी आस है,
घाटों में फिर रौनक हो,
यही गाँव की प्यास है।।

खोल दो सरकार नहर हमारी,
बहे धारा यह प्यारी प्यारी।
घाट बचाओ, रिवाज़ बचाओ,
गाँव हमारा फिर मुसकाओ।।

पहाड़ों से उतरती थी, एक धारा निर्मल,
गाँव के जीवन की थी वो साँस सरल।
चक्कियाँ गुनगुनाती थीं, गेहूँ की महक थी,
हर बूँद में बस रोटी की दहक थी।।

हमारे गाँव की शान पुरानी,
पंचक्की से जुड़ी कहानी।
नहर का पानी जीवनधारा,
सबका इसमें बसे सहारा।।

जानवी नेगी

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