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जचै ही कौनी”

“जचै ही कौनी”
बाणियो व्यापार बिना,
बीनणी सिंणगारबिना,
बारात ढोल बिना,
अर चौमासो बरसात बिना,
जचै ही कौनी।
बाग माली बिना,
जीमणो पातल बिना,
कविता छंद बिना,
अर फूल सुगंध बिना,
जचै ही कोनी।
आरती शंख बिना,
मोरियो पंख बिना,
घोड़ो दौड़ बिना,
अर गीत सुर ताल लय बिना,
जचै ही कोनी।
मर्द मूंछ बिना,
कांकड़ रूखबिना,
चाकूधार बिना,
अर पापड़ खार बिना,
जचै ही कौनी।
घर लुगाई बिना,
सावन पुरवाई बिना,
हिदो बाग बिना,
अर शिवजी नाग बिना,
जचै ही कौनी।
कुवो पाणी बिना,
तेली ढाणी बिना,
नारी लाज बिना,
अर संगीत साज बिना,
जचै ही कौनी।
इत्र महक बिना,
पंछी चहक बिना,
मिनख परिवार बिना,
अर टाबर संस्कार बिना,
जचै ही कौनी।
श्वेता ईनाणी ,उदयपुर,लेखिका, समाज सेविका, सेक्टर 4




