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धो देता है सावन मन का मैल

धो देता है सावन मन का मैल

 

रिमझिम-रिमझिम बरसे सावन, हरियाली मुस्काती है,

सूखी धरती की प्यास बुझाकर, जीवन-रस बरसाती है।

 

शीतल फुहारों के संग जैसे, खुशियों की बदली छाई,

मन के भीतर जमी उदासी, पल में दूर भगाई।

 

मिट्टी की सोंधी खुशबू से, महक उठे संसार,

झूले पड़ते डाली-डाली, गूँजे मधुर मल्हार।

 

बूँद-बूँद में प्रेम घुला है, बूँद-बूँद उपहार,

सावन मन को निर्मल करता, हर लेता संताप अपार।

 

क्रोध, कपट और द्वेष सभी को, बहा ले जाए पानी,

मन में फिर से प्रेम जगाए, मिटे कटुता पुरानी।

 

हरियाली की चादर ओढ़े, धरती लगे निराली,

प्रकृति सिखाए प्रेम बाँटना, यही ऋतु की खुशहाली।

 

धो देता है सावन मन का मैल,

भर देता जीवन में खुशियों का खेल।

 

नई उमंग से भरता मन, मिटती हर तकरार,

प्रेम-स्नेह की फुहारों से, खिल उठता संसार।

 

तन-मन पावन हो जाता है, मिट जाता हर जंजाल,

सावन केवल ऋतु नहीं, है प्रकृति का अनुपम उपहार।

 

स्वरचित 

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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