रीवा जिला न्यायालय से आया एक ऐसा फैसला, जिसने चेक बाउंस के मामलों और कथित सूदखोरी के नेटवर्क पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रीवा जिला न्यायालय से आया एक ऐसा फैसला, जिसने चेक बाउंस के मामलों और कथित सूदखोरी के नेटवर्क पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिरमौर चौराहा स्थित सर्च रतन किराना स्टोर के संचालक रामरतन गुप्ता द्वारा दायर किए गए नौ लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में न्यायालय ने आरोपी सतीश पांडे को दोषमुक्त कर दिया है।
मामले में दावा किया गया था कि सतीश पांडे ने एसीसी और प्रिज्म सीमेंट की करीब 3600 बोरियां उधार ली थीं और उसी के भुगतान के लिए नौ लाख रुपये का चेक दिया था। लेकिन सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने ऐसे तथ्य न्यायालय के सामने रखे, जिनसे परिवादी के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता रितेश गुप्ता ने तर्क दिया कि इतनी बड़ी मात्रा में सीमेंट की सप्लाई और परिवहन के संबंध में प्रस्तुत कहानी व्यवहारिक और व्यापारिक दृष्टि से विश्वसनीय नहीं है। साथ ही बिलों और व्यापारिक दस्तावेजों में भी कई विसंगतियां सामने आईं। न्यायालय के समक्ष यह भी पक्ष रखा गया कि संबंधित चेक सीमेंट खरीद का नहीं, बल्कि पूर्व में किराना व्यापार के दौरान दिया गया था, जिसका बाद में कथित रूप से अलग उद्देश्य से उपयोग किया गया।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए माना कि परिवादी यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि नौ लाख रुपये का चेक किसी वैध और विधिक रूप से प्रवर्तनीय देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था। न्यायालय ने कहा कि जब धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम का मूल तत्व ही प्रमाणित नहीं हो सका, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर सतीश पांडे को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।
बताया गया कि यह चेक वर्ष 2016 में अनादरित हुआ था, जिसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा और लगभग दस वर्ष तक चली सुनवाई के बाद 30 जुलाई 2026 को फैसला सुनाया गया।
इस मामले के बाद एक और बड़ी चर्चा सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि रामरतन गुप्ता द्वारा इसी प्रकार के 500 से अधिक चेक बाउंस के मामले विभिन्न न्यायालयों में दायर किए गए हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इस संबंध में सक्षम एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया है। वहीं स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि चेकों का उपयोग कथित सूदखोरी से जुड़े लेन-देन में किया जाता रहा है। इन आरोपों की भी न्यायालय द्वारा इस फैसले में पुष्टि नहीं की गई है और इन्हें केवल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
फिलहाल, जिला न्यायालय का यह फैसला चेक बाउंस मामलों में वैध देनदारी सिद्ध करने की कानूनी अनिवार्यता को एक बार फिर स्पष्ट करता है। साथ ही यह भी संदेश देता है कि केवल चेक का होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके पीछे वैध और प्रमाणित लेन-देन का होना भी न्यायालय में साबित करना आवश्यक है। माना जा रहा है कि न्यायालय के उक्त फैसले के बाद और कई पीड़ितों को न्याय मिलेगा।




