
गजल
रक्षाबंधन
काफिया –ते
रदीफ –हैं।
बहर–2222–2222–222=22
रेशम की डोरी का पर्व मनाते हैं,
भाई भी खुश होकर साथ निभाते हैं।
रोली चावल राखी दीप सजी थाली,
तिलक लगा राखी डोरी बँधवाते हैं।
बहना भाई की दीर्घायु दुआएँ की,
भाई भी सुख देने की सौं खाते हैं।
प्यार भरे इस पावन बंधन के रिश्ते,
जीवन में खुशियों के रंग सजाते हैं।
“सुरभि” सभी भाई बहनों का पर्व मने,
रेशम के धागे कवच बनें बॅंध जाते हैं।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




