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“फिर भी उड़ेगी”

ये कैसी आज़ादी..?

 

“फिर भी उड़ेगी”
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ये कैसी आज़ादी..?

पूछ रही है नारी.. . …
घर की चारदीवारी में कैद पड़ी है साँसें,
सपनों पर पड़े ताले, बातों पर पहरा।

सुबह से रात तक रसोई की भट्टी,
फिर भी ताने की है गिनती।
घर संभाले, बच्चे पाले,
और कहा जाए :
सारा दिन “तू क्या करती …?”
ये सब सारे व्यर्थ के काम…
ये कैसी आज़ादी.?
ये नहीं हमारी आज़ादी

21वीं सदी का बैनर लहराए,
चाँद पर झंडा, मंगल पर यान।
पर घर में रोक दिया उसकी उड़ान को … देकर
अभी भी “लक्ष्मण रेखा” का नाम।

पर सुनो…
ये सिसकियाँ अब चीख बनेंगी,
चीख ही दहाड़ बनेगी…
ये आँसू अब बनेंगे अंगारा ।
जिसमें हमनें दिन रात गुजारा ।
घूंघट भी हटेगा..
जंजीर भी टूटेगी….
क्योंकि नारी अब नारी रुकने वाली नहीं ।

वो घर भी चलाएगी,
वो आकाश भी छुएगी,
अपना झंडा स्वयं फहराएगी
स्वतंत्र आकाश में स्वतंत्र ही रहेगी ।
मांग नहीं …!
विश्वास है नारी का…
सजल हृदय का भाव है
स्वतंत्र रह कर जीने का अधिकार है ।
नारी हूं गर्व हैं
सम्मान से कहती हूं:
आयेगी अपनी भी
आज़ादी
और एक दिन गर्व से कहेगी नारी ।
“ये है मेरी आज़ादी” 🇮🇳
✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई

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