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ग़ज़ल

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ग़म सारे झेल कर भी शिकायत नहीं रही

मुझ में सवाल करने की ताक़त नहीं रही

 

सब कुछ गँवा के दिल को सुकून तब मिला है

अब और कुछ भी पाने की चाहत नहीं रही

 

देखा जो आइना तो ये दिल से कहा हमने

अब तुझ में भी वो पहली सी रंगत नहीं रही

 

थक हार के जो बैठे तो एहसास ये हुआ है

दुनिया में अब किसी से मोहब्बत नहीं रही

 

खुद से ये ‘राज’ अब तो यही कह रहा हूँ

मुझ में तो जीने की भी हसरत नहीं रही

 

✍️ डिआर संगम घिमिरे

भूमिकास्थान ९ अर्घाखाँची नेपाल

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