
ग़ज़ल
221 2121 1221 212
ग़म सारे झेल कर भी शिकायत नहीं रही
मुझ में सवाल करने की ताक़त नहीं रही
सब कुछ गँवा के दिल को सुकून तब मिला है
अब और कुछ भी पाने की चाहत नहीं रही
देखा जो आइना तो ये दिल से कहा हमने
अब तुझ में भी वो पहली सी रंगत नहीं रही
थक हार के जो बैठे तो एहसास ये हुआ है
दुनिया में अब किसी से मोहब्बत नहीं रही
खुद से ये ‘राज’ अब तो यही कह रहा हूँ
मुझ में तो जीने की भी हसरत नहीं रही
✍️ डिआर संगम घिमिरे
भूमिकास्थान ९ अर्घाखाँची नेपाल




