E-Paperसाहित्य रचना
शीर्षक -भक्ति का सागर

शीर्षक -भक्ति का सागर!
दिनांक -13/08/26
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दिल के अपने भावों का ,
पुष्पों का हार बनाकर।
प्रभु के गले में पहनाया,
अपने उर का अनंत प्यार।
अपने झीने से आंँचल में,
भरा हुआ करूणा का भार।
कैसे इतनी में पीड़ा सहूंँ ,
करो प्रभु!मुझ पर उपकार।।
पल-पल कृपा मुझ पर करना,
इसी लिए बैठी हूंँ आ तेरे द्वार।
मुझ विरहन को और न सूझे,
प्रभु करना मेरा तुम उद्धार।।
सफल हुई साधना मेरी,
मन खुशियों से हर्षाया।
घट- घट में मन भटका मेरा,
सुख तेरे ही चरणों में पाया।।
जो कुछ था पास मेरे वो,
भावों से तुमको मैंने चढ़ाया।
मुझ भक्तन के पास नहीं कुछ,
बस! फूलों का हार पहनाया।।
गागर से सागर में हृदय को
चैन आया!!
प्रेम भक्ति में बहती जाऊँ,
मीरा सी जोगनिया बन मैं।
जल प्रवाह सी बहती जाऊँ,
नदिया की धारा बनकर मैं।।
सुषमा सिंह”उर्मि,,
कानपुर




