
राम केवट संवाद
जय गणेश मंगल करें, पूर्ण होय सब काज।
विघ्न-विनाशक आप हैं,द्रवैं दीन पर आज।।
चले राम वनवास को, अनुज सिया के साथ।
बिलख रही नगरी सकल,करहु न नाथ अनाथ।।
राम आए गंग तटहि,पाय यह समाचार।।
आया केवट मिलन को,लेय विविध उपहार।।
पूछ कुशलता जब लगे, कंठ स्वयं प्रभु राम ।
केवट नैना जल भरा, मिला हृदय आराम ।।
लाओ अपनी नाव को, कहे राम सस्नेह ।
पुलकित केवट उर हुआ,नयननि बरसत मेह।।
दुविधा में केवट पड़ा,पद रज महिमा जान
नैया मेरी काठ की, नारी कियौ पाषान।।
जीविका का साधन यह, निर्भर है परिवार।
पैर पखारूॅं आपके,तब करूॅं प्रभु सवार ।।
सुन केवट के वचन यह, रहे राम मुस्काय।
जो भावै सो करहु तुम,गंगा पार कराय।।
आयसु पाय कठौत में,कीन्हौ चरण पखार।
धन्य धन्य केवट हुआ, हर्ष हुआ संचार।।
गंगा हर्षित हो गई,चरण लिपट कर राम।
नौका लहरों पर चली,गति ले मंद ललाम ।।
पहुॅंचे गंगा पार जब,अनुज सिया सॅंग राम।
सकुचाए क्या दें इसे, पास नहीं कुछ दाम।
माता सीता जानती,प्रभु के मन की बात।
त्यागी मुॅंदरी हाथ से,वृक्ष तजे ज्यों पात।
प्रभु उतराई इस समय ,करूॅं नहीं स्वीकार।
जब आऊॅं तव द्वार पे,करना भव सर पार।।
राम भक्ति का वर मिला,हुआ कृतज्ञ निषाद।
प्रेम अश्रु बहने लगे,मूक हुआ संवाद।।
स्वरचित
डॉ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार


