बीस रुपये का बंधन

बीस रुपये का बंधन
मेरा कोई सगा भाई नहीं था।
हर रक्षाबंधन पर जब घर की छतों पर राखियों की चमक दिखती, तो मेरी आँखें जाने क्यों अपने आप नम हो जातीं। एक खालीपन-सा लगता, जैसे इस त्यौहार में मेरी जगह ही न हो।
उस साल मैं अपने चचेरे भाई को राखी बाँधने गई। वो तब कक्षा तीसरी में पढ़ता था — छोटा-सा, दुबला-पतला, पर आँखों में बड़ी समझदारी लिए।
मैंने उसकी कलाई पकड़ी तो मेरी रुलाई फूट पड़ी। आँखों से जैसे गंगा-जमुना बहने लगी। मैं चाह कर भी खुद को रोक नहीं पा रही थी।
उसने मुझे रोते देखा तो घबरा गया। अपने नन्हे हाथों से मेरे आँसू पोंछने लगा और चुप कराते हुए बोला, “दीदी, मत रो।”
फिर उसने जल्दी से अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला और एक मुड़ा-तुड़ा बीस रुपये का नोट निकाला। मेरी हथेली पर रखते हुए बोला, “दीदी, ये आपके लिए। आप चुप हो जाओ।”
उसका वो देना देख मैं और जोर से रो पड़ी, पर इस बार आँसू दुःख के नहीं थे।
मैं जानती थी, इतनी छोटी उम्र में उसके लिए बीस रुपये कितने बड़े होते हैं। शायद कई दिनों तक टॉफी न खाकर, जेब खर्च से बचाकर रखे होंगे। उसे अपनी खुशी से ज्यादा मेरी उदासी की फिक्र की थी।
मैंने भर्राई आवाज़ में कहा, “ये तू रख ले। जिस दिन तू बड़ा होकर कमाने लगेगा, उस दिन दे देना।”
उसने पैसे वापस लेने से मना कर दिया और बड़ी मासूमियत से बोला, “नहीं दीदी, जब बहन राखी बाँधती है तो भाई गिफ्ट देता है। मेरे पास गिफ्ट नहीं है, मेरे पास सिर्फ ये बीस रुपये हैं। आप इसे रख लो।”
उस दिन मेरे हाथ में सिर्फ एक नोट नहीं, दुनिया का सबसे अनमोल तोहफा था।
वो बीस रुपये का नोट आज भी मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं, क्योंकि उसमें रेशम नहीं — विश्वास और प्यार बंधा था।
ममता साहू कांकेर छत्तीसगढ़




