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मेरी ख़ामोशियों का हमराज़

मेरी ख़ामोशियों का हमराज़

 

ख़्वाहिशों को ख़्वाब बना लेती हूँ,

दर्द को अक्सर मुस्कान बना लेती हूँ।

 

जो बात किसी से कह नहीं पाती,

उसे अपने अशआर में सजा लेती हूँ।

 

घर की ज़िम्मेदारियाँ, परेशानियाँ और दर्द,

अक्सर ख़ुद ही सँभाल लेती हूँ।

 

जब अकेली होती हूँ इस भीड़-भरी दुनिया में,

कलम को अपना हमराज़ बना लेती हूँ।

 

जो राज़ दिल में दबे रह जाते हैं,

उन्हें काग़ज़ पर अपनी आवाज़ बना लेती हूँ।

 

आँखों में ठहर जाए जब कोई अधूरा ख़्वाब,

उसे लफ़्ज़ों का एक गुलाब बना लेती हूँ।

 

किसी से शिकायत करना मुझे आता नहीं,

ख़ामोशी को ही अपना अंदाज़ बना लेती हूँ।

 

दर्द कितना भी गहरा क्यों न हो दिल में,

मैं हर आँसू को एक अल्फ़ाज़ बना लेती हूँ।

 

शबीहा, ये कैसी आदत है मेरी—

टूटकर भी ख़ुद को फिर से ख़ास बना लेती हूँ।

लेखिका 

शबीहा कौसर सीमा 

मुम्बई महाराष्ट्र

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