
विधा -तांका
विषय -ताप हरो हे शिव शंकर
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शिव से बड़ा
दरबार नहीं है
तू ही सबका
पालनहार भोले
तुम ही आदि,अंत।
जटा में गंगा
भागीरथी बहती
मस्तक पर
विराजत है चंदा
जग शीतल करे
शिव शंकर
पर जो आस्था रखे
प्रभु की कृपा
भक्तों पर बरसे
नैया किनारे लगे।
अमृत पान
देवता को कराया
विष अपने
कंठ धारण किया
जगत कल्याण को !
जग पालक
ताप हरो शंकर
उद्धार करो
मझधार में नैया
खेवनहार बनों!!
सुषमा सिंह उर्मि,,
कानपुर




