E-Paperसाहित्य रचना

नाव और स्त्री

शुभ मंगलवार, २५/०८/२६

           नाव और स्त्री

*********************

 नदी किनारे स्त्री बैठी 

उदास होकर बोली :

हमसे अच्छी तुम हो.. नाव… !

सब आते हैं खिलखिलाते बैठते हैं और तुम ..पार लगाती हो… !

नाव यह सुन रोकर बोली: मैं हुं नैया !

मेरा खेबैया है कोई और….

तुम हो स्त्री ! पर तुम्हारी और हमारी एक ही गति है !

मैं जब नई नई नैया बनी थी !

आलर झालर लगाकर खूब सजावर, पतवार से सुबह शाम खिंचा गया।

बहुत प्यारे दिन गुजर रहे थे !

खेवनहार खूब प्रसन्नता पूर्वक हमें सजाकर प्रतिदिन धनोपार्जन कर रहा था।

दिनोंदिन मैं घिसती गयी !

दर्द सहती गई ! अब देखो ये सुराख बन आया फिर भी दशा ये मेरी कि : इसे भर कर भी मुझे चलाया !

व्यथित हूं पर क्या कहूं …?

जब तक चल सकती हूं । इनके काम आ सकती हूं !तब तक आऊंगी इनके काम !

जब किसी काम की नहीं रहूंगी मेरा ही पतवार मुझ से लेगा किनारा !

किसी सूनी सी नदी के तट पर लगी रहूंगी !

तब मेरा भी न होगा कोई सहारा।

दुखी रहुंगी !

रोती रहूंगी !

जर्जर हो कर पड़ी रहूंगी !

फिर उसी में लुप्त हो जाऊंगी!

अब कहो! तुम से मैं कहाँ अलग हूं …?

तुम भी जब नई नवेली बन दुल्हन सी आई। स्वागत सम्मान पाई। दिन रात सबके हित के लिए अपना सबकुछ लुटाई!

जब तक शरीर रहा , परिश्रम कर खूब कमाई !

अपने परिवारजनों का स्वयं से ज्यादा किया !

सब हो गए दूर और आत्मनिर्भर…?

रह गई तुम भी अब अकेली…?

जर्जर सा शरीर…

दुखित मन…!

कहो सहेली.…!!

है ..न ..!!

हम दोनों की एक ही गति !!

स्त्री का मन शांत हुआ अपने जैसे ही दशा नैया में देखकर ।

बोली चलती हूं सहेली ….!

आती जाती रहूंगी मैं !

तुम संग दुःख बतियाती रहूंगी ..!

सच है कि जीवन के हर मोड़ से भयानक इस अवस्था में हम आते !!

पर प्रकृति का नियम यही है।

जो आज जवान है तो वह वृद्ध भी होगा ।

तब शायद इस अवस्था को समझेगा …..

क्या होता है … अकेलापन ..?

क्या होती है हमारी मनोदशा …?

शरीर जर्जर ….

मन में कितने प्रश्न …?

किसी की भी एक खिलखिलाहट के गूंज को सुनकर अपने सारे दुःख को भुलना…!!

बड़ा विचित्र ये अवस्था !!

    नाव और स्त्री

  की एक ही गति ….!!

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!