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सूनी कलाई और राखी”

“सूनी कलाई और राखी”

आज फिर राखी का त्योहार आया है, 

पर बहन का मन उदास पाया है, 

दूर परदेश में बैठा है जो भाई,

याद उसकी,आएतो आंख भर आई।

देखकर भाई की वह सूनी कलाई,

मन में एक हूक सी है, छाई

थाली सजाई है रोली से और दिए से 

रेशम का धागा तड़पे हैं जिए से 

ना आ सका भाई मिलने इस बार 

रेशम की डोरी पहुंचेगी सरहद पार,

तिलक ऑनलाइन होगा, पर दुआएं दिल से निकलेगी, 

हे ईश्वर ,मेरे भाई को रखना हमेशा सलामत, 

चाहे वह हो कितनी भी दूर क्यों ना? 

सूनी कलाई पर भी प्यार कम ना होगा,

भाई बहन का यह बंधन कभी काम ना होगा।।

श्वेता ईनाणी,उदयपुर ,समाज सेविका, लेखिका

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