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शीर्षक: जंतर-मंतर पधारो श्रीराम

शीर्षक: जंतर-मंतर पधारो श्रीराम  

 

अंजली सामंत

 

मेघश्याम रघुकुल-स्वामी श्रीराम,  

कमल-नयन, प्रसन्न-वदन, पीताम्बरधारी।  

आजानुबाहु, धनुर्धर श्रीराम,  

सीता-लक्ष्मण सहित पधारो राम॥1॥

 

रावण-संहारक प्रभु श्रीराम हैं।  

कितनी सीताएँ आज भी रावणों के चंगुल में हैं।  

घर-आँगन, गली-गाँव में  

रावण बैठे हैं, सीता-हरण की प्रतीक्षा में॥2॥

 

मारपीट और नरक-यातनाएँ सहन की जा रही हैं।  

प्रत्येक स्थान पर अहिल्या उद्धार की प्रतीक्षा कर रही है।  

जटायु के समान प्रतिदिन बेटियों के पंख काटे जा रहे हैं।  

गर्भ में ही बेटी को नरक में धकेला जा रहा है।  

माँ दुःखी है॥3॥

 

खेतों और खलिहानों में किसान  

फाँसी के फंदे पर झूल रहे हैं।  

अन्नदाता की बलि वृक्षों पर चढ़ रही है।  

बच्चे न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।  

पधारो प्रभु, इस अमानवीय जीवन में॥4॥

 

क्षण-क्षण आपके आगमन की प्रतीक्षा है  

जंतर-मंतर पर।  

प्रश्नपत्र लीक करके युवाओं पर लाठीचार्ज किया जा रहा है।  

द्रौपदी का भरे चौराहे पर वस्त्रहरण हो रहा है।  

अब इन राक्षसों को वनवास भेज दीजिए॥5॥

 

हे राम, भारत को ‘सुजलाम् सुफलाम्’ बनाइए।  

नेत्र पथ निहार रहे हैं।  

आ जाइए श्रीराम, जय श्रीराम॥6॥

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