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छल-कपट तो, कैसे पार लगे वैतरणी।

छल-कपट तो, कैसे पार लगे वैतरणी।

 

जब दिल छल कपट से भरा हो,

तो कैसे पार लगे वैतरणी?

सच तो यह है कि आज

मन में कुटिलता घर कर गई है।

हर कोई स्वयं को

आपका शुभचिंतक बताता है।

 

आजकल अधिकांश लोग

स्वार्थ में डूबे हुए हैं।

कहते हैं “हम आपके अपने हैं,

हमारी मित्रता सच्ची है।”

किन्तु मन में छल, कपट और मक्कारी लिए,

झूठ पर झूठ बोलते जाते हैं।

दिन रात यही योजनाएँ बनाते रहते हैं

कि किसी को कैसे फँसाया जाए।

वाणी तो मधुर होती है,

पर उनके मन का भेद

कोई समझ नहीं पाता।

 

मन में यह भ्रम रहता है

कि उनकी मक्कारी कोई जान नहीं पाएगा।

पर सोचो,

छल कपट के सहारे

वैतरणी कैसे पार होगी?

 

मनुष्य संसार को तो धोखा दे सकता है,

किन्तु प्रभु को नहीं।

इस सत्य को

सभी को हृदय से स्वीकार करना चाहिए।

 

जब तक मन निर्मल नहीं होगा,

जीवन में सच्ची उन्नति नहीं होगी।

इसलिए अपने अंतर्मन को शुद्ध करें।

उसमें प्रेम, दया, दान, धर्म,

क्षमा और मानवता जैसे

श्रेष्ठ गुणों का प्रवेश होने दें।

 

तभी हृदय पवित्र बनेगा,

तभी प्रेम का विस्तार होगा।

शुद्ध हृदय में ही

श्रीकृष्ण का वास होता है।

तभी जीवन की वैतरणी भी

सहज ही पार हो जाएगी।

 

— नीलम प्रभा सिन्हा

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