धो देती है सावन मन का मैल

धो देती है सावन मन का मैल
आया सावन, झम-झम बरसी,
भीग गया सबका मन भी,
भीग गई तुलसी हरी,
और खिलने लगे फूल पौधे सभी।
घर आँगन को भीगो दिया पानी,
सावन में जब पानी बरसी,
धो देती है मन के मैल सभी।
गुस्सा हो, या गिला हो, या शिकवा हो,
सभी को सावन बहा ले जाती।
मन के सूखे खेतों में भी
जम जाती है पानी की नमी,
सूखे रिश्तों में भी
हरियाली ला देती।
टूटे सपनों में भी
फिर से नया जोश भर देती।
परत दर परत जो गंदी हो गई थी,
जो मैल मन में जम गई थी,
सावन की फुहार पड़ते ही
मन का वह मैल धुल गया,
मन का हर कोना खिल गया।
मन में जो काली-काली घटाएँ थीं,
वे भी बादल बनकर बरस गईं।
मिट्टी में खुशबू बिखरने लगी,
सभी पेड़ पौधे धुलकर चमकने लगे।
मचलने लगी उम्मीद,
फिर से आशा जग गई।
सावन आया,
तन और मन दोनों धो दिया।
मन स्वच्छ हुआ
और दिल खिल गया।
सावन में खूब भीगना
धो देता है सारा मैल,
मन का सारा मैल।
— नीलम प्रभा सिन्हा




