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सार छंद

सार छंद

 

दिनांक -21/08/26

 

कितनी सुंदर कितनी न्यारी, लगती धरा हमारी।

अनुपम रचना रची सृष्टि ने, लगती जग में प्यारी।।

 

पत्ता -पत्ता है सिखलाता, भूपर खुशहाली हो। 

धरा पल्लवित ये सदा रहे, पग-पग हरियाली हो।।

पुष्पों से धरती भरी रहे, महके बगिया क्यारी।

अनुपम रचना रची सृष्टि ने, लगती जग में प्यारी।।

 

वृक्ष लगा हरियाली लाना, जब ऑक्सीजन होगी। 

वृक्षों से धरणी को सजाएँ, धरा पल्लवित होगी।।

पेड़ लगाएँ सभी हजारों, होता गुण में भारी।

अनुपम रचना रची सृष्टि ने, लगती जग में प्यारी।।

 

         सुषमा सिंह*उर्मि*

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