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दर्पण

१९/०८/२६, दिन :- बुधवार

        दर्पण

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सुबह उठकर जैसे ही दर्पण में अपने को देखा !

दर्पण ने कहा: तु अब पहले जैसी नहीं,

झट से माथे पर बिंदी लगाकर देखा !

फिर दर्पण ने कहाः तु अब पहले जैसी नहीं,

फिर थोड़ी सज सवर कर देखा!

फिर भी दर्पण वही कहा !

गुस्से से मैंने भी कहा जा तुम्हें बदल दुंगी !

दर्पण ने कहा : फिर क्या होगा,….. 

तुम भी तो बदल गई ना !

मैंने कहा : मैं कहां बदली , उम्र के साथ चेहरा बदल गया बस !

दर्पण कहा : अरे! पगली उम्र तो सबकी बढ़ती है बस तुम बदल गई ।

मैंने भी कहा : बहुत हो गया तेरा दर्पण ! 

जो कहना है सीधे कहो,

दर्पण : तुम जो हो वही चेहरा मैं दिखलाता हूं । पर पहले तुम मुस्कुरा कर मुझे देखती थी।

खुशी से देखती थी।

चहककर देखती थी ।

अब… थक कर देखती हो !

हार कर देखती हो !

गुस्से से देखती हो।

तुम सच में बदल गई हो।

मैं मोबाइल तो हूं नहीं जो तुम्हारा बिगड़ा बनाबटी चेहरा बदल-बदल कर दिखा दूं ।

दर्पण हूं तेरा !

तेरा वास्तविक रूप ही दिखाऊगा !

अच्छा अब समझी !

धन्यवाद मेरे दर्पण !

मैं तुम्हें अब हमेशा वैसे ही दिखुंगी जैसा मैं स्वयं के लिए चाहती हूं।

लेकिन तुम मुझे संभाल लेना जब मैं रोते रहूं तो !

दर्पणः रोनेवाला चेहरा बहुत खराब लगता है । जा मैं भी नहीं देखता ।

मैं और मेरा दर्पण साथ में मुस्कुराए !

दर्पण ने झट से कहा : हाँ यही हो तुम !

मेरी प्यारी वाली !

तुम मत बदलो !

कठिन परिस्थिति से लड़ो, जीतो !

हँसते रहो !

मुझ में अपना आत्म विश्वास देखो !!

      सच !

कहा दर्पण नहीं बदलता । हम बदल जाते हैं। दर्पण जो है, वास्तविक वही दिखलाता ।

दर्पण नहीं बदला , पर हम बदल रहे हैं।

अब हंसता हुए एक बार अपने को दर्पण में देखो !

दर्पण क्या कहता ….. ?

😊✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

           मुम्बई

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