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नागपंचमी विशेष

 शिव-नागदेव आराध्य हैं

नागपंचमी विशेष

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     शिव-नागदेव आराध्य हैं

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शिवमय तो यह जीवन,

      शिव विहिन तो है मरण।

ये कारण सदाशिव ओर,

      बढ़ते हैं यकायक चरण।।

 

सर्पयज्ञ राजाजन्मेजय के,

      आस्तिक मुनि ने रुकवाये।

नाग वंश की रक्षा कर ही,

      चूहों के प्रकोप रुकवाये।।

 

किसान ही तो अन्नदाता,

      शिव ही बनाते हैं संतुलन।

प्रकृति संतुलित रखने वे,

      जीवों के कराते हैं मिलन।।

 

शिवमय है लखचौरासी,

      गले विराजते हैं नाग देव।

शिवमय जड़-चेतन जग,

      कण-कण रहते महादेव।।

 

शिव सदा कल्याणकारी,

       मरघट में है उनकी शाख।

छल-कपट पंचतत्व मुक्त,

       सस्नेह स्वीकारते हैं राख।।

 

भगवान शिव के आशीष,

       नाग पंचमी पूजा से पाते।

सुरक्षा,प्रकृति का सम्मान,

        जीवों का महत्व जताते।।

 

श्रावण शुक्ल पक्ष पंचमी,

       नागपंचमी में पूजा युक्ति।

शिवा को प्रिय आभूषण,

        कालसर्प दोष से है मुक्ति।।

 

शिव ही संतुलित प्रकृति,

         शिव से ही हम ज्ञान भरें।

शिव-नागदेव आराध्य हैं,

        नागपंचमी को ध्यान धरें।।

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स्वरचित मौलिक रचना संग

सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”

हथखोज / देमार (पाटन)

तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़ 

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