विषय :- “धो देती है सावन मन का मैल

विषय :- “धो देती है सावन मन का मैल”
२१/०८/२६, शुक्रवार
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पावन सावन के भाव में
बह चली अविरल धारा …
जैसे माता गंगा धो देती है
अपवित्र को पवित्र कर देती
सावन भी वैसे ही आई….!
रिमझिम रिमझिम बरसा लेकर आई!
शीतलता की बुन्दें हर्षाई !
पावस ले रहा अंगराई.. !
कारी कारी मेघ गर्जन से बिजली की चमक है आई!
खुशियों की अमृत बुन्दों संग तृप्त करने वसुन्धरा को आई !!
धरा गगन में खुशियां छाई !
हरियाली की चुनर ओढ़े सुहावनी सावन है आई।
मन का सारा मैल हटाने…
पावन जल से हमें नहाने….
शिवशम्भू को जल चढ़ाने !!
स्वयं सावन बन कर आई !!
ऐसा शुभ संयोग है लाई !
हर्षित लहलहाती फसलें दे रही सावन को बधाई ।
कृषक परिवार में खुशहाली लाई !!
एक तरफ बम भोले गुंजमान हो रहा ।
एक तरफ तीज कजरी की घटा है छाई ।
झुला से सज गए बाग बगीचे
राखी लेकर बहना आई ।
तन मन ऐसे ….धो देती है सावन,
मन के तम को दूर करती
स्वयं से स्वयं मिलवाती…
अंहकार को दूर भगाकर,, दोनों अपने हाथ उठाकर शिवशम्भु के सामने अपने को करते अर्पण ।
सावन के शुभ अमृत बुन्दें धो रही है मन का मैल ।
नई उम्मीद जगा कर नव दुल्हन सी सज धज कर…. सजीली सावन आई !!
सारे मन का द्वेष हटाकर जैसे आ रही है बेटी… पीहर !
वैसे ही हरियाली की चुनर ओढ़कर सावन है आई ।
वसुन्धरा के उपवन को सजाई !
हरियाली के आंचल में खुशियां भर भर कर है लाई !!
धो देती है सावन सारे जन जन के मन का मैल !
प्रेम भाव भक्ति भावना मन में जगा जाती है ।
तन मन को पवित्र करने ही सावन शुभ संकेत संग आती है।
धो कर सारे मन का मैल सावन ! स्वयं शिव से मिलने आती है !!
✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई




