यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं

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यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं
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मनुष्य जन्म तो हीरा मे कोहिनूर,
मानवता की सेवा तो मैं तिष्य हूॅं।
स्वयं को निमित्त मान लूॅं यहाॅं पर,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी समझना मूर्खता है,
व्यापक ब्रह्म में तिनका सा दृश्य हूॅं।
जन्म-मृत्यु बीच जीवन सत्य जब,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।व्यवहार में निपुणता लाना जरूरी,
पंचतत्व दिखते पर जीव अदृश्य हूॅं।
यह सार्थक शिव से ही लखचौरासी,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलयुग चारों में,
दिखते सदा सभी स्थूल परिदृश्य हूॅं।
जो जड़-चेतन सब में शिव बतलाऍं,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।जड़ भी चलायमान अदृश्य सत्ता से,
पृथ्वी गतिमान इस काल भविष्य हूॅं।
जो शिव से सृजित मनुज वैकल्पिक,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।अनन्त अनादि पारब्रह्म परमेश्वर हैं,
ज्ञान कहे बहती गंगा धारा नित्य हूॅं।
मानवीय विकास सभ्यता ऐसे ही है,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।सम्पूर्ण ज्ञानी अजन्मा अविनाशी हैं,
बस लौकिक पंचतत्व मैं अनित्य हूॅं।
अलौकिक सूक्ष्म जीव अमर है तब
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।शिवपुराण में युग और कल्प समाये,
सजरा जगत शिवमय तो मैं भृत्य हूॅं।
यही है जीवन का असल सार तभी,
यह सकल जगत ज्ञानी मैं शिष्य हूॅं।।
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स्वरचित मौलिक रचना संग
सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”
हथखोज / देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़
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