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सपना

सपना

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अचानक से सपना में आज प्रभू दिखे !

प्रभु बोले : क्यों उदास रहती हो तुम ?

बोलो आज ! तुम्हारी सारी ईच्छा पूरी कर दूं ! क्षण में तथास्तु कह दूं !

मैं बोली सच में आप प्रभु हैं मेरे !

क्यों इतनी देर लगा दिए …?

रात को मुझे सोते हुए जगा दिए …. !

सुबह पता हैं ना … कितनी काम करना होता है …. !

जाईए अभी मैं आपसे गुस्सा हूं ।

प्रभु मुस्काते बोले : अरे पगली ! मैं भी कितने काम छोड़कर आया हूं …?

तुम बोलो न क्यों होती हो उदास..?

मैं भी बोली : इतने सारे दुःखों का पहाड़ क्या सिर्फ मेरे लिए ही रखे थे और कोईनहीं मिला था …

इन दुःखों के कारण ही मैं हो जाती हूं उदास …

प्रभु बोले : बिना दुःख के सुख कहां … ये तो जीवन का नियम है।

तुम ऐसा करना कि अपने सारे दुख को सुन्दर सुगंधित पुष्प समझना ! भारी पर्वत का टुकड़ा नहीं … !

भारी पर्वत भा टुकड़ा लगे तो कहीं जमीन पर रख देना मैं देख लुंगा … !

एक बार ये कर के देखना ….

फिर मैं दूसरे दिन बताता हूं जल्दी ही फिर सपने में आता हूं !

प्रभु चले गए और मैं सो गई।

प्रात : जब उठी मन बहुत खुश था। जैसा प्रभु ने कहा बस वैसा ही करने की कोशिश करती रहती हूँ।

जो दुख का बोझ भारी लगता उसको जमीन पर रखकर उनको स्मरण करती हूँ।

छोटी छोटी उदास भरी पोटली को सुंगंधित पुष्पों से भरती हूं।

तभी से मैं यूं ही हंसती रहती हूँ।

अब फिर प्रभू कब आएंगे सपने में, 

इसीलिए विस्तर पर जल्दी सो जाती हूं।

मेरा उदास सा चेहरा उनको नहीं भाता है !

अपने अधरों पर हंसी रखती हूं !!

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

      मुंबई

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