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सावन शिवरात्रि – एक भक्त की पुकार

सावन शिवरात्रि – एक भक्त की पुकार

 

रिमझिम रिमझिम सावन बरसे,भीगी धरती अंबर सारी,

कांधे कांवर,हाथ गंगाजल, चले जा रहे दुनिया सारी।

 

बेलपत्र, धतूरा,अक्षत ले,मन में एक ही आस प्रभु,

भोलेनाथ विनय करती हूं,बुझ जाये अब प्यास प्रभु।

 

गरीब,अमीर के बंधन तो,जग केवल ही बनाए हैं,

भोले के शिवालय में ,सबको शिव गले लगाए हैं।

 

सावन की काली रात है,भोले तेरे द्वारे मैं हूं खड़ा,

हाथ में बस एक लोटा जल, मन में लिए दर्द बड़ा।

 

जल की धारा बह जाने दो,ढह जाने दो जीवन के पाप,

सावन की शुभ शिवरात्रि पर, मिट जाए सारी संताप।

 

दुनिया ने ठुकराया है, अपनों ने रिश्ता छोड़ा है,

एक तेरा ही दर है भोले, जहाँ नाता मुझसे जोड़ा है।

 

न सोना,धन मुझको चाहिए,ना ही माया का संसार,

न महल-अटारी मांगू भोले, न मांगू हीरे का हार।

 

एक बूंद तेरी करूण कृपा की, मुझ पर वर्षा कर देना,

उलझी हुई राहों पे खड़ी, प्रभु जी राह सही कर देना।

 

तूने गंगा को अपने जटा में, जगह दे दिये शिव भोले,

मुझ जैसे घोर पापिन को, प्रभु अपने चरणों में लेले।

 

सावन की आज शिवरात्रि है, शिव मेरी सुन ले पुकार,

बेलपत्र,न दूध लाई हूं,केवल लाई आंसू के धार।

 

स्वीकार करो भोले इसे, अपने चरणों में दो स्थान,

चन्द्र ठुकराई है जग से, उसके सब पाप हरो भगवान।

 

  चन्द्रकला शर्मा 

   प्रधान पाठक 

बेमेतरा छत्तीसगढ़

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