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रचना: “शस्त्र ही श्रृंगार”

३१/०७/२६, शुक्रवार

 रचना: “शस्त्र ही श्रृंगार”

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास 

 

बहुत खनकी चूड़ी अपनी, 

बहुत खनकी चूड़ी अपनी,  

अब थाम ले शस्त्र अपनी।  

चमका दे उसकी धार,  

चमका दे उसकी धार,

काट दे वही हाथ तत्काल,  

जो छूने आए वस्त्र तेरा।  

 

  

न आएगा पुकारने पर कोई कृष्ण,  

न बनेगा अब कोई रक्षक।  

अपने चीर की रक्षा खुद कर,  

आत्मविश्वास की ज्वाला में जल।  

कुदृष्टि जो पड़े, उस आँख को फोड़ दे,  

कोई घटना होने से पहले ही रोक दे।  

 

  

मत खनका चूड़ी अब,  

हाथों में खनके तलवार।  

हटा दे सिर से चुनरी,  

वीरों का चोला पहन ले।  

धरा जब भारी लगे अचानक,  

तो धरा फाड़ निकल तू सीता।  

रावण के विनाश को खुद कर ।

 

  

तू ही सीता, तू ही द्रौपदी,  

तू ही झांसी की रानी,  

तू ही अहिल्याबाई का मान।  

हाथ में शस्त्र ले, काली-दुर्गा बन जा।  

आँख से आँख मिला कर कह दे –  

“अब न होगा चीरहरण,  

अब न होगा अत्याचार।”  

 

  

देखो, नारी ने भी उठा लिया शस्त्र,  

अपनी रक्षा स्वयं करेगी,  

अपनी रक्षा स्वयं करेगी …

किसी से न मांगेगी गुहार ।

चूड़ी उतार फेंकी,  

शस्त्र को ही आभूषण मान लिया।  

अब खनकेगी सिर्फ शस्त्र की झनकार।  

 श्यामा प्रभाकर दास

मुम्बई

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