लहू से सींची आज़ादी की दास्ताँ

लहू से सींची आज़ादी की दास्ताँ:–
माटी के कण-कण में लिखी,वीरों की बलिदानी गाथा,
लहू से सींची आज़ादी की,भारत माँ की अमर दास्ताँ।
जब अत्याचारों की आँधी ने,भारत का आँगन घेरा था,
तब मंगल पांडे ने सबसे पहले, विद्रोह का बिगुल फेरा था।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई,रण में बनकर ज्वाला आई,
नानासाहब,तात्याटोपे नें आजादी की आंधी लाई ।
काकोरी की पावन धरती पर,क्रांति का दीप जलाया था,
रामप्रसाद बिस्मिल ने हँसकर,माँ का कर्ज चुकाया था।
अशफाक ,बटुकेश्वर , सावरकर को माँ का मान रहा,
“आज़ाद हूँ आजाद रहूँगा” शेखर महान रहा।
भगत सिंह के वन्दे मातरम् से,गोरों
की नींव हिली थी,
राजगुरु,सुखदेव,के कारण क्रांति की मशाल जली थी।
हँसते-हँसते फाँसी चढ़े वे,मृत्यु बनी जिनकी जयकार,
उनके रक्त की हर बूँद ने,लिख डाला स्वतंत्रता-संसार।
नेताजी सुभाष की हुंकारों ने,
सोई चेतना जगाई थी,
“तुम मुझे खून दो…” कहकर,
आजादी की राह बनाई थी।
अनगिन नाम रहे इतिहास में,
अनगिन चेहरे अनजाने,
जिनके कारण आज हम जीते,
आजादी के पर्व सुहाने।
फिर आया वह स्वर्णिम दिन,पंद्रह अगस्त की भोर हुई,
सदियों की गुलामी टूटी,भारत की जय-जयकार हुई।
लाल किले पर तिरंगा बोला “अब अपना है आसमान,
शहीदों के सपनों से गूँजा,भारत का गौरवगान।
सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’
इन्दौर मध्यप्रदेश




