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द्वार

06/08/26, गुरुवार

           द्वार

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कैसे कहूं प्रभु ! तुमसे…

आना मेरे ही द्वार…….

 

बहुत काज होता है तुमको…

*कैसे लगा दोगे पार* ।

स्वस्थ काया देकर अवतरित किया ।

दिया सार्माथ अपार ।

 

सुन्दर दो नयनों से देखूं तेरी ही छवि हजार ।

कभी पतझड़ तो कभी मधुमास

कभी निरस तो कभी सरस

दे दिए इतने संग

 

फिर भी मुझे कहीं चित न लगे

नैना तेरी राह तके ।

 

मन के सारे भाव छोड़ कर

दौड़े आते वैसे ही

जैसे मित्र सुदामा के लिए नंगे पांव भागे तुम ।

 

इतनी भाग्यवान नहीं मैं….

जो मैं कहूं और तुम मान जाओ…..

 

काज बहुत होते हैं तुमको

चहुं ओर तुम देखते हो ।

अन्तर्यामी प्रभु तुम हो !

फिर कैसे स्वार्थ में फंस कर कह दूं…

 

आना मेरे द्वार ।

तुम तो प्रभु हो !

तुम ही जानो.. कितनी विनती करू मैं , फिर भी

 

कारज जब हो जाए पूर्ण

शून्य चेतना होने से पहले

कोशिश तो करना प्रभु 

सिर्फ ,एक ही बार… ।

 

पता नहीं द्वार खोल पाऊंगी कि नहीं…

विमुख हो जाए संसार।

 

हाथ पकड़ कर तब ले जाना तुम अपने ही द्वार*  ।

 

चाहे मत आना मेरे द्वार…

 

मुझे ही ले चलना अपने संग अपने ही निज द्वार ॥

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

           मुंबई

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