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दीप बुझने से पहले

दीप बुझने से पहले

 

गौरव! बेटा, ज़रा टीवी बंद कर दो। सुबह से बस आग, प्रदर्शन और हिंसा की खबरें ही देख रहे हो।” माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई।

 

गौरव बिना नज़र हटाए कहा, “माँ, सब लोग यही देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यही चल रहा है। आज शहर में बड़ा प्रदर्शन है। दोस्त भी बुला रहे हैं।”

 

बैठक में बैठे पिता ने अख़बार मोड़ते हुए कहा, “बेटा, अपनी बात कहना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब विरोध हिंसा में बदल जाए तो सबसे पहले आम लोगों का नुकसान होता है।”

 

इतने में दादी तुलसी को जल चढ़ाकर आईं। उन्होंने टीवी की ओर देखा। धुएँ से भरी सड़कें, टूटे हुए वाहन और डरे हुए लोगों के चेहरे दिखाई दे रहे थे।

 

दादी धीरे से बोलीं, “आग कभी यह नहीं पूछती कि सामने अपना है या पराया। वह सब कुछ जला देती है।”

 

गौरव चुप रहा, लेकिन उसका मोबाइल लगातार बज रहा था।

 

“जल्दी आ… सब पहुँच रहे हैं। आज दिखाना है कि हम भी पीछे नहीं हैं!”

 

उसने जूते पहनने शुरू किए।

 

तभी छोटी बहन अन्वी दौड़ती हुई आई।

 

“भैया, आज मुझे चित्रकला प्रतियोगिता में छोड़ने चलोगे? आपने वादा किया था।”

 

गौरव ठिठक गया।

 

“आज नहीं… बाद में।”

 

अन्वी का चेहरा उतर गया।

 

यह दृश्य देखकर दादी बोलीं, “बेटा, जो अपनी छोटी-सी ज़िम्मेदारी निभा नहीं सकता, वह समाज बदलने निकल पड़े, तो पहले स्वयं से प्रश्न करना चाहिए।”

 

इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई।

 

सामने पड़ोस के सेवानिवृत्त शिक्षक आचार्य शरण खड़े थे।

 

उन्होंने मुस्कराकर पूछा, “कहाँ चल दिए, गौरव?”

 

“दोस्त बुला रहे हैं… प्रदर्शन में।”

 

“जिस विषय पर प्रदर्शन है, उसे कितना पढ़ा है?”

 

गौरव ने सिर झुका लिया।

 

“सच कहूँ, मैंने केवल सोशल मीडिया के वीडियो देखे हैं।”

 

आचार्य शरण ने शांत स्वर में कहा, “आज सबसे बड़ा संकट जानकारी की कमी नहीं, अधूरी जानकारी का अहंकार है। भीड़ सोचती नहीं, बहती है। विवेक हमेशा अकेला चलता है।”

 

इतने में बाहर सायरन की आवाज़ गूँज उठी। कुछ लोग भागते हुए दिखाई दिए। थोड़ी ही देर में धुएँ का गुबार आसमान में फैल गया।

 

अन्वी डरकर माँ से लिपट गई।

 

“माँ… लोग अपने ही शहर को क्यों जला रहे हैं?”

 

घर में सन्नाटा छा गया।

 

आचार्य शरण ने कहा, “जब क्रोध विवेक पर भारी पड़ जाता है, तब अपने ही घर की दीवारें भी दुश्मन लगने लगती हैं।”

 

गौरव ने मोबाइल उठाया। मित्रों के समूह में केवल एक संदेश लिखा

 

“मैं अपनी बात शांतिपूर्ण और वैधानिक तरीके से रखने के पक्ष में हूँ, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ का हिस्सा नहीं बनूँगा।”

 

कुछ ही क्षणों में संदेश आने लगे—

 

“डरपोक!”

 

“तू बदल गया है!”

 

गौरव ने कोई उत्तर नहीं दिया।

 

उसने अन्वी की ओर देखा और कहा, “चलो, तुम्हें प्रतियोगिता में छोड़ आते हैं।”

 

रास्ते में एक बुज़ुर्ग अपनी टूटी हुई दुकान के सामने खड़े थे।

 

उन्होंने कहा, “बेटा, तीस साल की कमाई कुछ मिनटों में राख हो गई। जिन्होंने तोड़ा, शायद उन्हें यह भी नहीं मालूम कि इस दुकान से मेरे परिवार का चूल्हा जलता है।”

 

गौरव की आँखें नम हो गईं।

 

शाम को वह फिर आचार्य शरण के पास पहुँचा।

 

“गुरुजी, क्या सचमुच एक युवक समाज बदल सकता है?”

 

आचार्य मुस्कराए।

 

“समाज भीड़ नहीं बदलती, चरित्र बदलते हैं। एक जागरूक युवक सौ भटके हुए युवाओं को दिशा दे सकता है।”

 

अगले रविवार से गौरव ने मोहल्ले के युवाओं के साथ ‘संवाद सभा’ शुरू की। वहाँ मोबाइल से अधिक पुस्तकें खुलने लगीं। बहस से पहले तथ्य पढ़े जाने लगे। बुज़ुर्ग अपने अनुभव सुनाने लगे और बच्चे प्रश्न पूछने लगे।

 

धीरे-धीरे मोहल्ले का वातावरण बदलने लगा।

 

एक दिन पिता ने गर्व से कहा, “बेटा, आज समझ आया कि शिक्षा डिग्री से नहीं, दृष्टि से पूरी होती है।”

 

दादी ने दीपक जलाते हुए कहा, “घर का एक दीपक जल जाए, तो उसकी रोशनी से कई दीप अपने-आप जगमगा उठते हैं।”

 

रात को पूरा परिवार एक साथ बैठा। मोबाइल एक ओर रख दिए गए। भोजन के साथ हँसी भी परोसी गई।

 

अन्वी ने अपनी चित्रकला का पुरस्कार दिखाया। चित्र में एक दीपक था, जिसकी लौ से अनेक दीप जल रहे थे।

 

नीचे उसने लिखा था—

 

“अँधेरा कभी अँधेरे से नहीं मिटता, एक छोटा-सा दीप ही पर्याप्त होता है।”

 

 

 

डॉ अपराजिता शर्मा

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