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देश की बीमारी – जातिगत आरक्षण

देश की बीमारी – जातिगत आरक्षण

 

ये कैसी बीमारी है जो,देश को खाये जा रही है,

देश में योग्य व्यक्ति को भी पल-पल दफना रही।

 

जात पूछ कर कुर्सी, और नौकरी बांटी जाती है,

मेहनत करने वाले यहाँ रोज़ हार जाती है।

 

एक मेहनत से रात भर पढ़ कर,नंबर लाते हैं,

दूसरा छात्र वृत्ति के भरोसे मौज उड़ाते हैं।

 

वे हंसकर कहता है कि हमारा जात ही काफी है,

पर मेरी तो किस्मत में केवल कर‍ना ही माफी है।

 

क्या देश यही समानता का सपना देखा था,

क्या संविधान ने यही एकता का नियम ये लिखा था।

 

जो काबिल है वो तो हमेशा पीछे रह जाते हैं,

देखो कोई जात के नाम सब कुछ पा जाते है।

 

आरक्षण गरीबी पर हो तो देश सुंदर जायेगा,

काबिलियत के हौसले बढ़े जब आगे आयेगा।

 

पर जात का जहर तो देश के अंदर फैल चुका है,

देश को डुबाके रहेंगे ये मन में ठान चुका है ।

 

देश को गरीबों पर ही आरक्षण होना चाहिए,

जात नहीं, योग्यता का सम्मान होना चाहिए।

 

स्कूल में पढ़ाई छोड़कर जाति निवास बनवाना होगा।

पालक नहीं कर पाते गर तो शिक्षक को ही भरवाना होगा।

 

पूरा नहीं करने पर स्पष्टीकरण निकलता है,

या नहीं तो शिक्षक के मेहनत का वेतन कटता है।

 

वाह रे अंधा कानून कैसा यह कानून बनाया है,

अपने वोट बैंक के खातिर ऐसे लोगों को बिठाया है।

 

सब जानते हैं फिर भी अपने आंखें मूंदे बैठे हैं,

जाति के नाम पर खूब धन को देश से ऐंठे है।

 

एक तिरंगा,एक देश,एकता ही हो हमारा संविधान,

फिर क्यों बंटा हुआ है अब भी जाति पर हिन्दुस्तान।

 

 चन्द्रकला शर्मा 

प्रधान पाठक 

 बेमेतरा छत्तीसगढ़

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