E-Paperसाहित्य रचना

सबको एक अदद  गुलाम की जरूरत है।

सबको एक अदद 

गुलाम की जरूरत है !

फिर वो …

अल्लादीन का चिराग घिसो…

और जिन्न आ कर कहे!

जो हुकूम मेरे आका!

सबको एक अदद ….

गुलाम की जरूरत है 

बार बार आ कर अपना 

हुकूम बजा बैठे

हर बार पूछे 

क्या हुकूम है मेरे आका

घर की चार दिवारी में ऐसी ही कुछ स्थिति उन काबिले तारीफ़ महिलाएं की है

जो हर बात पर …

क्या हुकूम…..

क्या हुकूम….

करते करते सबको बिगाड़ रखी है

अरे कुछ उन्हें भी करने दो…

ऐसी ही चाहत रखते है मर्द

बीबी मिले तो बस वही

प्यारी सी गुलाम!

हर काम में आपका साथ दे

और बिलकुल भी ना थके 

चेहरे पर कोई छोटी सी भी शिकन ना हो….

जब चाहे जो चाहे!

आप हुकूम कीजिए!

बीबी रूपी गुलाम हाज़िर है!

और इन बीबियों को भी बड़ा अच्छा लगता है..

हुकूम बजाना….

एक आवाज पर सरपट दौड़ी चली आती है

जैसे की उनको कोई काम ही नहीं है….

भुगतो अब!

करो अब!

बदल नहीं सकती

तो इस जिंदगी को ऐसे ही जियो……

तुमने ही बनाया है अपना जीवन!

थोड़ा सा भी बेपरवाह बनती तो निकाल लेती अपने लिए खुशनुमा पल!

सबकी प्यारी बनने के लिए खुद को ही मिटा दिए!

अब किसे परवाह…..

बताओ

अब किसे परवाह…

एक छोटी सी सुकून के लिए भी वक्त देखना परता है …..

    ✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

  😊😊😊

  थोड़ा तो खुद के लिए समय निकालो क्योंकि कोई भी पति नहीं चाहता उसकी पत्नी गुलाम बने!

उन्हें सिर्फ मित्र रूपी पत्नी चाहिए !!

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