हार जीत

हार जीत ——- — जहां पर जीत दिखती है वही तो हार समाई है।
हर जीत ए मधु हार के बाद ही पाई है।
तैयारी कितनी करनी है यही तो हार के जाना है,
लड़ने से पहले तो दुश्मन के बल को ही कहां पहचाना है?
हरा के पांडवों को कौरवों की खुशी का कहां ठिकाना था।
द्यूत क्रीड़ा में जीतने पर ही हुई थी उनकी हार सुनिश्चित, यह उन्होंने बाद में माना था।
कर्म की न्यारी गति को जिसने भी जाना है।
कृष्ण को सखा अपना जिसने भी माना है ,
याद रहता सदा उसको कि वो ना कुछ लेकर आया है और ना ही कुछ लेकर जाना है।
जीत हो या हार जिसने दोनों को सम ही माना है।
सत्य मार्ग को अपनाकर जिसने भी अपना कर्तव्य निभाया है।
सफल केवल उसने ही धरती पर अपने जीवन को पाया है।
हार हो या जीत जीवन में इन दोनों को ही पाना है,
सफल होना हो तो याद रखना जीत को सिर पर और हार को दिल पर नहीं चढाना है।———- मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




