E-Paperसाहित्य रचना
समर्पण

समर्पण
अश्रु जल से सीच- सीच कर
अपने तन मन को धोया है।
पश्चाताप की अग्नि में
तप कर कुंदन सा निखराया है।
अपनी हवा में उड़ती उड़ती भावनाओं को कस कर कैद कर आई हूं।
अपने सब अवगुणों को अब फूल बनाकर लाई हूं श्रद्धा के सुमन की माला चरणों में मैं अर्पित करने लाई हूं।
पूजा की थाली में सब कुछ अपने दुष्कर्मों को सजा कर लाई हूं।
जग के दोहरे व्यक्तित्व के माया जाल से उब कर
तेरे समक्ष समर्पित होने आई हूं जग में मात्र में कठपुतली
तुम जैसे चाहो नाच नचाओ।
यह तो है सब तेरी मर्जी अब जैसे भी स्वीकार करो मैं सब कुछ अर्पित करने आई हूं।नीलम प्रभा सिन्हा




