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चातुर्मास संयम का पर्व

चातुर्मास संयम का पर्व

 

आषाढ़ से कार्तिक माह तक, चातुर्मास शुभ योग रहता,  

चातुर्मास कहलाता है,जब धर्म-कर्म संयोग बनता।  

 

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से, कार्तिक मास पूर्णिमा तक,

चातुर्मास शुभ पावन अवसर , संयमित जीवन लेते व्रत।

 

देव सो जाते क्षीर सागर पर, शयन करें बिष्णु भगवान,  

संयम-तप का चातुर्मास का, धरती पर होते हैं मान।

 

मंदिरों में गूंजे भजन, घर-घर में दीप जलाते हैं,  

जीवों पर दया करके, मन के कपाट खुल जाते हैं।

 

नहीं नए कोई काम शुरू, नहीं मांगलिक कार्य होता,  

व्रत-उपवास-दान-धर्म से,मोक्ष का द्वार खुला होता। 

 

सत्य वचन मधुर वाणी, मन में शांति का रहते वास,  

चार मास के तप साधना से, कट जाते जन्मों के त्रास।

 

सावन, भादो, क्वार, कार्तिक पावन चारों मास है,  

श्री विष्णु जी की कृपा से, हो जाए क्लेश का नाश है।  

 

खुद को जानो, प्रभु को मानो, यही जीवन का सार है,  

चातुर्मास का यही संदेश,होते आत्म-उद्धार है।

 

चार मास संयम करो, तन-मन में शुद्ध विचार लाए, 

चातुर्मास की संयम त्याग, ले जाए भव से पार।

 

चातुर्मास का ये संयम, जीवन भर का साथ रहे।

चातुर्मास का नियम हरि से, आत्मा के संग मिले।

 

चातुर्मास प्रकृति भी सिखाए,शांत रहो और सहन करो,

अंतर्मन के देव जगाओ,बाहर का शोर हनन करो।

 

व्रत-उपवास-दान-धर्म, मंदिरों में गूंजे भजन,

जीव मात्र पर दया रखो, यही है सच्चा हरि पूजन।

 

संयम तन,मन,सत्य वचन, संयम वाणी विचार,

नये काम आरंभ नहीं,शांत हो जाते व्यापार।

 

  चन्द्रकला शर्मा प्रधानाध्यापिका छत्तीसगढ़

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