
विषय:- सावन मन भावन
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पावनतम है सावन मन भावन
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आषाढ मास बोनी करके किसान,
देखें अंकुरण सिलसिला सुहावन।
पौधा जब बढ़े रोपाई के काबिल,
लगते रिमझिम सावन मन भावन।
सावन में चमकती हुई बिजुरिया,
गगन में आच्छादित रहे बदरिया।
मुसलाधार बारिस तो कहीं झड़ी,
वाढ़ में भी है जीवन की गुजरिया।।
अल्पवृष्टि-अतिवृष्टि ढ़ाते हैं कहर,
वृष्टि समभाव सहज रखते बसर,
सबकुछ सुहाना लगता है हमको,
देख सावन मन भावन का असर।।
किसानों के लिए खेतों में खपते,
निदाई और रोपाई का ये मौसम।
अन्नपूर्णा के अन्नदाता माटी पुत्र,
फसलों की लहराई के हैं मौसम।।
सावन माह आत्म मंथन अवसर,
शिवालय के दिखते पवित्र डगर।
जलाभिषेक और पूजा अर्चना से,
फकत हम ध्यान देते हैंं चरित्र पर।।
लखचौरासी में पक्षी के कलरव,
मंडूक के टर्र-टर्र लगते सुहावन।
तीज त्यौहार आगाज देकर यह,
पावनतम है सावन मन भावन।।
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स्वरचित मौलिक रचना संग
सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”
हथखोज। / देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़
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