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स्वार्थ और परोपकार

स्वार्थ और परोपकार

 

स्वार्थ आज की दुनिया में सर्वोपरि हो गया है,

हर मानव अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगा है।

 

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहंकार,

ये हैं माया के रोग, मन के विकार।

मन में ही ये पलते-बढ़ते रहते हैं,

मानव के जीवन को दुःखों से भरते हैं।

मानसिक पीड़ा का यही आधार बनते हैं,

और अंततः नरक के द्वार तक ले जाते हैं।

 

गरीबों की सहायता करना, भूखों को भोजन देना,

पशु-पक्षियों पर दया करना ही सच्चा मानव धर्म है।

दया, तप और दान मनुष्य का कर्तव्य हैं,

यही जीवन के सर्वोत्तम सद्गुण हैं।

इंसानियत वही दिखा सकता है,

जिसके हृदय में दया और ममता का वास होता है।

किन्तु हर हृदय इतना निर्मल कहाँ हो पाता है,

जब माया का प्रभाव बढ़ता ही जाता है।

 

माया के बंधन में बँधकर मनुष्य

अपने ही स्वार्थ का दास बन जाता है।

परोपकार की भावना क्षीण पड़ जाती है,

हर क्षण केवल अपना हित ही दिखाई देता है।

सब अपने स्वार्थ की पूर्ति में व्यस्त रहते हैं,

तो मानवता के गुण मन में कैसे पनपते हैं?

 

जिसके मन में दया, सेवा, तप और दान की प्रवृत्ति हो,

वही सच्चा परोपकारी बन सकता है।

वही समाज में प्रेम, करुणा और सद्भाव का दीप जला सकता है।

 

किन्तु जब गरीबी जीवन को सताती है,

और अपनी आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पाती हैं,

तब परोपकार करना कठिन प्रतीत होता है।

स्वार्थवश मनुष्य ऐसे कर्म भी कर बैठता है,

जिनसे कभी उसे संकोच होना चाहिए।

 

माता-पिता हों, भाई-बहन हों या पड़ोसी,

आज अधिकांश संबंधों में स्वार्थ की छाया दिखाई देती है।

स्वार्थ के कारण ही प्रेम भी सीमित हो जाता है,

और अपनापन कहीं खो जाता है।

 

यह कलियुग है, भाई!

हर कोई अपना स्वार्थ देखता है।

ऐसे समय में प्रश्न यही उठता है—

परोपकार का मार्ग कौन अपनाता है?

 

आओ, अपने भीतर दया, सेवा और करुणा का दीप जलाएँ,

स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवता का धर्म निभाएँ।

यही सच्चे जीवन का पथ है,

और यही मनुष्य होने का श्रेष्ठ अर्थ है।

 

— नीलम प्रभा सिन्हा

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