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स्वाभिमान का पंख

स्वाभिमान का पंख

 

स्वाभिमान का पंख लगाकर,

ऊँची भरता उड़ान।

 आँधी चाहे कितनी आए,

 रखता अपनी शान॥

 

सत्य, साहस के पथ पर चलना,

जिसका दृढ़ संकल्प।

 लोभ, प्रलोभन, भय से ऊपर, 

उसका निर्मल कल्प॥

 

झुकना केवल प्रेम हेतु हो,

अन्यायों के सामने नहीं। 

धैर्य, विवेक, कर्म की ज्योति, 

होती उससे कहीं सही॥

 

काँटों वाली राह मिले तो, 

हिम्मत फिर भी हार न मान। 

संघर्षों के बीच खिलाता, 

आशा का नव मधु-गान॥

 

मानव का सच्चा आभूषण,

धन-दौलत या ताज नहीं।

स्वाभिमान से जीने वाला,

 जग में होता लाज नहीं॥

 

जिसके भीतर दीप जले हों,

आत्मविश्वास अपार।

 उसके सम्मुख फीके पड़ते, 

वैभव के सब श्रृंगार॥

 

आओ ऐसा जीवन जीएँ, 

बढ़े सदा सम्मान। 

स्वाभिमान का पंख लगाकर, 

छू लें नभ की आन॥

 

स्वरचित 

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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