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नटराज तांडव

नटराज तांडव

 

जब सृष्टि में असंतुलन बढ़ा,  

जब पाप का बोझ बढ़ने लगा,  

तब कैलाश पर गूंजा है डमरू, 

शिवजी ने तांडव करने लगा।

 

पहला पद में धरती डोली,  

दूसरे पग में सागर उछले।  

तीसरे में तारे टूटे गगन से,  

चौथे में समय भी संभले।

 

जटाएं खुली, अग्नि लपटे,  

गले में नाग, और मुंडमाला।  

हाथ में डमरू, हाथ में अग्नि,  

कमर में धारे शिव मृगछाला ।

 

आनंद तांडव में सृजन है,  

रुद्र तांडव में दिखे संहार ।  

हर थिरकन में कल्याण छुपा,  

हर मुद्रा में छिपे संदेश अपार ।

 

डमरू से निकली हर ध्वनियां,  

बनीं संस्कृत के सूत्र अधार।

तांडव से जन्मा नृत्य कलाएं,  

संगीत में ओम् का आकार।

 

जो इस नृत्य को समझ ले,  

वो भय से मुक्त हो जाए।  

अंत में भी शुरुआत शिव है,  

मृत्यु में मोक्ष को पा जाए।

 

नटराज का तांडव तो देखो,  

प्रलय है तो प्रेम भी समाये।  

शिव नाचते जग कल्याण को,  

हर जीवन फिर से मुस्काए।

 

    चन्द्रकला शर्मा 

     प्रधान पाठक 

   बेमेतरा छत्तीसगढ़

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