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मोहब्बत का पैग़ाम

“मोहब्बत का पैग़ाम”
काश ऐसी कलम मिले, अपना हिंदुस्तान लिखूँ,
नफ़रत की दीवारें गिराकर, मोहब्बत का पैग़ाम लिखूँ।
हर चेहरे पे रौनक़ हो, हर आँख में अरमान लिखूँ,
अमन की शीतल छाँव में, महकता गुलिस्तान लिखूँ।
जात-पात, मज़हब से ऊपर इंसानियत की पहचान लिखूँ,
हर लब पे मुस्कान रखूँ, हर दिल में स्वाभिमान लिखूँ।
सीमा पर डटे वीरों का अमर बलिदान लिखूँ,
मिट्टी के हर ज़र्रे में उनका परचम-सा मान लिखूँ।
तिरंगे की शान में देशभक्ति का सम्मान लिखूँ,
हर बच्चे की नन्ही आँखों में भारत का अभिमान लिखूँ।
गंगा की निर्मल धारा, हिमालय की ऊँची शान लिखूँ,
खेतों की हरियाली संग, मुस्काता हिंदुस्तान लिखूँ।
हर आँगन में दीप जलें, हर मन में उजियारा लिखूँ,
अमन, प्रेम और भाईचारे से महकता हिंदुस्तान लिखूँ।
लेखिका: शबीहा कौसर “सीमा”
मुम्बई, महाराष्ट्र




