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कारगिल दिवस

 

कारगिल दिवस

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर, शहीदों का लहू बोला,
सीना गर्व से चौड़ा हुआ, जब
दुश्मन को पछाड़ छोड़ा।

कारगिल के घाटी पर,दुश्मन चुपके से सरहद आया,
विजय का बिगुल बजा हिन्द
ने तिरंगा लहराया।

कैप्टन विक्रम, मनोज पांडेय,
टाइगर हिल पर चीखें थे,
कम डिग्री में भी लड़ते रहे,पर
हौसले बहुत ऊँचे थे।

मां के बेटे ,बहन के भाई,बेटे के पिता कुर्बानी दिये,
तिरंगे में लिपट कर आये,देश खातिर बलिदानी हुए।

बहनों की है राखी छिन गई, चूड़ी, बिंदिया लौट न पाई,
माता की गोदी रही सूनी,सुनी सावन की अमराई।

माता-पिता के बेटे शहीद हुए, आज कारगिल के घाटी पर,
देश के झंडा गाड़ दिये वो,वीर कारगिल के माटी पर।

आज हम चैन से सोते हैं,जब
वो सरहद पर जागते हैं।
कारगिल के वीरों को नमन,
जिससे देश महकते हैं।

धरती की छाती पर वीरों,बन त्रिषूल गड़ जाते हैं,
कारगिल की गाथा लिखूं तो नभ भी छोटे पड़ जाते हैं।

भारत मां के अमर शहीदों को,
करते हैं दिल से सम्मान,
जब तक सूरज चांद रहेगा,
देश में रहेंगे उनके नाम।

चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़

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