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नारी के अरमान

 

नारी के अरमान
डॉ. अंजली सामंत

समाज के हर वर्ग में नारी को आज भी वस्तु समझा जाता है।
बचपन में माँ-पिता के प्रेम की बौछार होती है।
सुराल में आकर वही नारी नौकरानी और सेविका बनकर रह जाती है॥1॥

चाहे घर हो या कार्यालय, उसे दूसरा दर्जा ही मिलता है।
उसकी शिक्षा की, उसकी उपाधियों की कोई कीमत नहीं लगाई जाती।
उससे बस अपेक्षा है – खाना बनाओ, सेवा करो, और “हाँ जी हाँ जी” कहो॥2॥

वट-सावित्री का व्रत करके वो सात जन्मों तक पति की गुलामी माँगती है।
आज की शिक्षित नारी अंधविश्वास की शिकार बनती।
फिर भी समाज उसे हर कदम पर टोकता है, रोकता है॥3॥

पति की गालियाँ सहकर भी वो अपना कर्तव्य निभाती है।
उच्च शिक्षा प्राप्त नारी भी घर की चारदीवारी में कठपुतली बनकर दम तोड़ती है।
उसके लिए जीना ही एक लंबी मौत है॥4॥

उसके ज्ञान के तारे एक-एक कर टूटते जाते हैं।
अपने अस्तित्व के लिए लड़ते-लड़ते वो थक जाती है।
समाज बाहर से आधुनिकता का दिखावा करता है॥5॥

नारी एक जीता-जागता शव है,
जो तानों और शब्दों की आग में रोज़ जलती है।
श्मशान की चिता तो बस एक बार जलती है॥6॥

कब मिलेगा हर नारी को बराबरी का अधिकार?
नारी के अरमान… आज भी जलती हुई चिता हैं॥7॥

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