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शीर्षक  यह कैसी ज़िंदगी

 

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यह कैसी ज़िंदगी

 

 

“सावली, तैयार हो गई?” माँ ने रसोईघर से आवाज़ लगाई।

 

स्कूल के लिए बस पकड़नी है, टिफ़िन तैयार करना है, बाल बनाने हैं, फिर बस-स्टॉप तक छोड़ने जाना है। अलसुबह कितने काम होते हैं!

 

साकेत अब बड़ा हो गया है। उसके पापा और साकेत सुबह से ही मोबाइल लेकर बैठ जाते हैं। कुछ काम कहने पर बच्चों के पापा का एक ही जवाब होता—

 

“तुम्हें क्या काम है? अपना काम करो।”

 

शमी बाप-बेटे की ओर शिकायत-भरी नज़रों से देखती रह जाती। उसने साकेत से कितनी बार कहा था, “खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब।” लेकिन वह कहता, “नहीं मम्मी, अब हमें नवाब नहीं, साइंटिस्ट बनना है।”

 

पापा ने तो दोनों बच्चों को सिर पर चढ़ा रखा है। स्कूल के बाद खाते हुए टीवी देखना, फिर ट्यूशन से देर रात लौटकर मोबाइल, इंटरनेट और कंप्यूटर में लग जाना, फिर सो जाना—यही उनकी दिनचर्या बन गई थी। मैदान और पार्क जैसे उनकी ज़िंदगी से गायब हो गए थे। शायद समय की कमी और शमी के मन में बढ़ती असुरक्षा की भावना ने भी बच्चों की मनमोहक धमाचौकड़ी छीन ली थी।

 

सावली को बस में बैठाकर लौटी शमी ने गुस्से में कहा, “देखो जी, आप ही इन बच्चों में डिजिटल गेम्स और मोबाइल पर हॉरर दृश्य देखने की आदत बढ़ा रहे हैं। इनकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी।”

 

“चुप रहो! क्या बकवास कर रही हो? मैं क्यों गलत आदत डालूँगा?”

 

बात बढ़ने लगी। आज शमी राकेश से इस विषय पर गंभीरता से चर्चा करना चाहती थी। बच्चे पैदा करने की इच्छा के साथ उनका उचित पालन-पोषण करने की ज़िम्मेदारी भी होती है। क्या यह बात राकेश नहीं समझता?

 

पालनपुर का मकान छोड़ते समय उसने कितनी बार कहा था, “राकेश, माँ-बाबूजी को साथ ले चलो। बच्चे खुश रहेंगे।”

 

वह आगे बोली, “तुम नहीं जानते कि बच्चों का मोबाइल से इतना लगाव क्यों बढ़ रहा है?”

 

“बस, बहुत हो गया। इसलिए कहता हूँ, तुम चुप रहा करो।”

 

अब शमी स्वयं को असहाय और अकेला महसूस करने लगी थी।

 

घर का काम करते-करते उसने सुना, साकेत डाइनिंग टेबल थपथपाते हुए चिल्ला रहा था, “मम्मी, नाश्ता!” लेकिन उसकी नज़र मोबाइल से हट नहीं रही थी। शमी ने दोनों बच्चों को नाश्ता कराया।

 

उसके मन में गहरी उथल-पुथल मची थी। बच्चों को घर के बुज़ुर्गों की बहुत ज़रूरत होती है। उन्हें दाल-रोटी से लगाव नहीं, जंक फूड प्यारा लगता है। ऊपर से राकेश भी उनकी पसंद की चीज़ें लाकर उनकी आदतें बिगाड़ रहा है।

 

“हे भगवान! मैं क्या करूँ?” सोचते-सोचते शमी अनेक प्रश्नों में उलझ गई।

 

उसी समय पड़ोसन सीमा आकर बोली, “अरे शमी, तुम्हें पता है? चारू के बेटे ने अपने पापा को मार दिया।”

 

“क्या बात कर रही हो?”

 

“सच। पापा ने उसके हाथ से मोबाइल छीन लिया था। गुस्से में उसने पास पड़ी लाठी से उन पर वार कर दिया।”

 

“ओह! फिर?”

 

“सिर में गंभीर चोट आई है। अस्पताल में भर्ती हैं।”

 

शमी को मानो अपने भय का उत्तर मिल गया।

 

उसने सीमा के लिए चाय बनाई और मन की भड़ास निकालते हुए बोली, “मोबाइल पर गेम देखने से मना करने पर साकेत भी बहुत गुस्सा करता है। सावली भी भैया को देखकर वैसा ही करती है। इन आदतों का सबसे पहले असर आँखों पर पड़ता है। स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। खाने-पीने में भी वही चाहिए, जो मोबाइल या टीवी पर दिखता है। फिर घर में लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं।”

 

सीमा बोली, “अरे! हमारे घर में तो हर समय शांति रहती है। सभी अपने-अपने कोने में बैठकर मोबाइल देखते रहते हैं। कोई किसी से बात ही नहीं करता।”

 

शमी ने गंभीर स्वर में कहा, “लेकिन सीमा, यह हमारे संस्कारों के विपरीत है। हम अपने ही लोगों से दूर होते जा रहे हैं और अनजाने में गलत आदतों को बढ़ावा दे रहे हैं।”

 

“तुम्हें पता है, पिछले साल राजू चौकीदार को भी उसके साहब के बेटे ने चाकू मार दिया था। कारण बहुत मामूली था। चौकीदार ने सिर्फ इतना कहा था कि बगीचे में बैठकर मोबाइल मत देखो, थोड़ा घूमो-फिरो और व्यायाम करो।”

 

“हाँ शमी, तुम सही कह रही हो।”

 

तभी साकेत धड़ाम से घर में आया। वह तेज़ आवाज़ में बड़बड़ा रहा था, “देख लूँगा उन सब मास्टरों को, जो मुझे मना करते हैं।”

 

शमी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

 

“कुछ नहीं। उन लोगों ने मेरा मोबाइल छीन लिया।”

 

सीमा और शमी किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो उठीं।

 

दोनों अस्त होते सूरज की तरह मौन थीं, पर उनके भीतर एक नया संकल्प जन्म ले रहा था। वे एक-दूसरे की ओर गौर से देख रही थीं—मानो आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिए अब कोई ठोस निर्णय लेना ही होगा।

अमिता मराठे,

इंदौर मध्य-प्रदेश

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