जय जगन्नाथ रथयात्रा

जय जगन्नाथ रथयात्रा
जगन्नाथ प्रभु नाम है,पुरी जिनका धाम है।
जग के पालनहार को,शत-शत मेरा प्रणाम है॥
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के शुभ पावन दिन,
निकलती प्रभु जगन्नाथ की दिव्य सवारी।
दर्शन पाने को उमड़ पड़ता जनसागर,
गूँज उठती है हर ओर जय-जयकारी॥
संग रहते भ्राता बलभद्र बलशाली,
मध्य विराजें सुभद्रा बहना प्यारी।
सुदर्शन चक्र भी साथ सुशोभित रहते,
धन्य हुए भक्त निहार दिव्य छवि न्यारी॥
छोटे-छोटे हाथ, चरणों का नहीं आकार,
अधगढ़ी-सी मूर्ति में अनुपम दिव्यता सारी।
भावों से जो दर्शन करते श्रद्धापूर्वक,
उन पर बरसती प्रभु की कृपा अपार न्यारी॥
पावन नीम की लकड़ी से प्रतिमाएँ बनतीं,
नवकलेवर की अद्भुत परम्परा है प्यारी।
नंदीघोष रथ प्रभु जगन्नाथ का कहलाता,
गरुड़ध्वज इसकी शोभा है अति न्यारी॥
तालध्वज रथ बलभद्र का वैभव दर्शाता,
देवदलन रथ सुभद्रा का मन हर लेता।
रंग-बिरंगे भव्य रथों की छटा निराली,
देख भक्तों का हृदय प्रेम से भर जाता॥
जगन्नाथ के रथ में सोलह चक्के शोभित,
बलभद्र के रथ में चौदह चक्के प्यारे।
सुभद्रा के रथ में बारह चक्के सुशोभित,
तीनों रथ अनुपम, अद्भुत और न्यारे॥
सबसे ऊँचा नंदीघोष रथ कहलाता,
फिर तालध्वज का वैभव मन को भाता।
देवदलन भी अनुपम शोभा बिखेरता,
हर श्रद्धालु दर्शन कर धन्य हो जाता॥
रथ की रस्सी छूने को आतुर जन-जन,
मानो मिल जाए जीवन का वरदान।
भक्ति, प्रेम और समर्पण के इस उत्सव में,
गूँज उठता है पूरा भारतवर्ष महान॥
श्रीमंदिर से चलकर प्रभु गुंडिचा धाम पधारें,
जहाँ मौसी माँ के घर दस दिन विश्राम करें।
फिर ‘बहुदा यात्रा’ के शुभ पावन अवसर पर,
अपने निज श्रीमंदिर को पुनः प्रस्थान करें॥
जय हो जगन्नाथ, जग के पालनहारे,
सबके जीवन में भर दो प्रेम उजियारा।
भक्ति, सेवा, सद्भाव का दो ऐसा वरदान,
मंगलमय हो सारा जग, जय जगन्नाथ हमारा॥
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




