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छल-कपट से कैसे पार लगे वैतरणी

 

दिनांक : 12.07.2026

 

छल-कपट से कैसे पार लगे वैतरणी

 

दुनियादारी का बोझ लेकर,

जो चले छल-कपट की राह।

कैसे पार करेगा वैतरणी,

होकर इतना बेपरवाह॥

 

सत्य की नाव में बैठा राही,

अलबेलापन दिखला रहा।

लोभ-अहंकार कीे पतवार लेकर,

भोलेपन का रूप बना रहा॥

 

दया, धर्म और विश्वास भूलकर,

बंधा हुआ है विकारों की जंजीर।

श्मशान-सा हो गया जीवन,

कैसे होगी वैतरणी पार॥

 

करुणा की भावना से आलोकित,

कर दें हम यह सारा संसार।

प्रभु-सेवा से जीवन श्रेष्ठ बनाकर,

खोल दें कल्याण के द्वार॥

 

स्नेह-सुधा से धुल जाएं पापाचार,

लेकिन मान-शान की झूठी चाह ले,

इच्छाओं का करता जयजयकार,

कैसे होगी वैतरणी पार?

 

मैं-पन का अशुद्ध आचरण छोड़,

त्याग दे अब देह-अभिमान।

हरि की मधुर स्मृति में डूबकर,

हो जाना है वैतरणी पार॥

 

मनसा, वाचा, कर्मणा से जब

बहेगी अमृत की धार।

कर्म हमारे हों विशुद्ध, पावन,

निर्मल हो व्यवहार॥

 

अज्ञान अंधियारे को समझकर 

  कर ले वैतरणी पार।

तब होगा सत्यराम का एहसास,

अंतर्मुखी बन फिर बाह्यमुखता का लेना है आनन्द।

 

अमिता मराठे 

लेखिका एवं समाज सेविका

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