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जिन्दगी

जिन्दगी

 

स्वार्थी जिन्दगी हो गई है अभी सभी की।

माता-पिता साथ नहीं रहते फिर भी आपस में प्रेम नहीं।

अकेले-अकेले रह रहे सभी फिर भी जोड़ियाँ टूट रही।

हाय-हाय कर रहे सभी स्वार्थ वस सभी।

 

कमाते बहुत हैं फिर भी संतोष की कमी।

असंतोष बढ़ रही है सभी में मैं ही महान हूँ।

औरौं से भी।

अब गाँव में रहते नहीं नौकरी के भरोसे जी रही।

 

जिन्दगी सभी बनी।

हर चीज का अहंकार बढ़ रही अपने को सुपर मैन।

समझते सभी।

कमाते बहुत फिर भी लोन पर ही जीवन रखें।

 

लोन का बोलबाला है सभी चीज लोन पर खरीदते।

सोशल मीडिया पर जी रहे हैं सभी।

ऑनलाइन की सुविधा से सामान खरीद रहे सभी।

अब बाजार जाना भी चाहते नहीं।

 

कैसे मन लगता है मोबाइल के सहारे ही जी रहे।

सभी।

दिन रात मोबाइल के सहारे जीते और आसरा।

सिर्फ मोबाइल की ही रहती।

 

कहीं आना जाना नहीं बात-चीत किसी।

से नहीं।

घर में भी मोबाइल से ही बात चीत होते रहती।

अब की जिन्दगी भागम भाग की हो रही।

 

क्षण भी चैन लेने नहीं देती है जिन्दगी।

बैठे ही सभी काम अपना Work to home।

करती।

बैठे बैठे ही अपनी बीमारी को भी।

 

न्योता देते रहती।

घर में भी न किसी से बात चीत होती।

नजरें सिर्फ लैपटॉप पर ही टिकी रहती।

कब ऑफिस से फोन आ जाए।

 

इस लिए हर समय सतर्क रहती।

आज की जिन्दगी व्यस्त जिन्दगी होती।

किसी को किसी के लिए फुरसत नहीं है।

आज की जिन्दगी कठिन है बड़ी।

 

आई बात समझ में औरों की।

अपनी जिन्दगी भई दूसरे की अपने में।

जी भी नहीं सकती।

इस विषम स्थिति में रह कर नींद।

 

नहीं आती।

यह आज की जिन्दगी है अभी की।

 

– नीलम प्रभा सिन्हा

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