शीर्षक:–पानी नहीं खून हैं।

शीर्षक:–पानी नहीं खून हैं।
जो रक्त की कीमत न जानें
क्या जाने भविष्य की कीमत
शिक्षा की नहीं कोई कीमत
पढ़ें लिखें का दौड़ नहीं हैं।।
गिरा जमी पर जो लहूँ पानी नहीं खून हैं।।
धूमिल होते भविष्य पर जो उठ रहें सवाल।
ज्ञान का संसार क्यों बन गया विवाद
उठ रहा आवाज आज कल का भविष्य हैं।
जो लड़कियाँ सड़क पर देश का सम्मान हैं।।
गिरा जमीं पर जो लहूँ पानी नहीं खून हैं।
जो सपने आँखों में अँधेरे में खो गया।
लोकतंत्र का अर्थ लोक विवाद हो गया।।
शांति मार्ग पर क्यों बिछ गया कंकड़ हैं
जो मारे कूचले गए देश का भविष्य हैं।
गिरा जमीं पर जो लहूँ पानी नहीं खून हैं।।
आपस में लड़कर नाम कर रहें बदनाम
मिली जो आजादी हमें कर रहें बेकार
अपनी ही कानून हो रहा बेजार
क्या इसी पर होगा नवभारत का निर्माण?
जो टूट रहे बिखर रहें वो भारत माँ का लाल हैं।
गिरा जमीं पर जो लहूँ पानी नहीं खून हैं।।
स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा




