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शीर्षकःबदलते रिश्तों

शीर्षकःबदलते रिश्तों
डॉ. अंजली सामंत
आज के दौर में रिश्ते पैसों से बनते और बिगड़ते हैं।
शादियाँ सोने-चाँदी का सौदा बन गई हैं,
प्यार का कोई ठिकाना नहीं रहा॥1॥दिखावे की चमक-दमक, धन का नशा सर चढ़कर बोलता है।
लक्ष्मी चंचल है – आज यहाँ, कल वहाँ डेरा जमाती है॥2॥धन का गुलाम बनकर कट रही है ज़िंदगी।
अपने ही बेटा-बेटी मीठी बातों से धन ऐंठ लेते हैं॥3॥अमीर भाई गरीब बहन को पहचानने से इनकार कर देता है।
आज के जमाने में सुदामा जैसा मित्र भाग्य से मिलता है॥4॥जेब में पैसा आते ही रिश्तेदार बढ़ जाते हैं।
इंसान लालची हो गया, मतलबी हो गया॥5॥कर्ण ने तन से कवच-कुंडल उतारकर दान कर दिए।
हरिश्चंद्र ने सत्य के लिए राजपाट तक लुटा दिया॥6॥पर आज संस्कारों में दरारें आ गईं।
रिश्तों की नींव हिल गईं।।7।।




