शीर्षकःसूनी कलाई का रक्षाबंधन

शीर्षकःसूनी कलाई का रक्षाबंधन
रक्षाबंधन बहन और भाई के पवित्र प्रेम का प्रतीक है।
यह पर्व जाति-पाति और धर्म के बंधनों से ऊपर है।
भाई अपनी बहन की रक्षा के लिए जीवनभर का बंधन स्वीकार करता है॥
सीमा पर देश की रक्षा में तैनात सैनिक की कलाई सूनी रहती है।
वे घर-परिवार छोड़कर राष्ट्रसेवा के लिए चले गए।
बहन प्रतिवर्ष उनकी राह देखती है और पत्र में राखी भेज देती है।
परंतु भाई अपने ही हाथ से राखी कैसे बाँधे?
कभी धन के अभाव में रिश्ते बिखर जाते हैं,
तो कभी अमीरी-गरीबी की खाई में उलझ जाते हैं।
कभी मृत्यु कलाई को सूना कर जाती है,
तो कभी भाग्य में बहन ही नहीं होती।
जहाँ प्रेम है, वहाँ भाई नहीं,
जहाँ भाई है, वहाँ प्रेम नहीं।
हर संबंध आज विवश है।
सूनी है हथेली, सूना है जीवन।
सूनी हैं कलियाँ, सूना है आँगन,
सूना है गाँव, सूने हैं रिश्ते।
आज धन ही सब कुछ बन गया है।
रिश्ते-नाते रिक्त हैं, गलियाँ सूनी हैं।
बचपन बीत गया, रक्षाबंधन पीछे छूट गया।
कलाई सूनी है, जीवन सूना-सूना है।
नामः अंजली सामंत
सदस्य क्रः1256




